भारत में समलैंगिक समुदाय के लिए 150 वर्षों के संघर्ष और अनिश्चितता के बाद

भारत में समलैंगिक समुदाय के लिए 150 वर्षों के संघर्ष और अनिश्चितता के बाद, एक औपनिवेशिक युग कानून…

भारत में समलैंगिक समुदाय के लिए 150 वर्षों के संघर्ष और अनिश्चितता के बाद, एक औपनिवेशिक युग कानून जिसने एक ही लिंग के बीच संभोग पर प्रतिबंध लगा दिया था आखिरकार उसको हटा दिया गया है।

सीएनएन की रिपोर्टों के मुताबिक भारत में एलजीबीटीक्यू अधिकारों के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय कहा जा सकता है। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर, 2018 को समलैंगिक यौन संबंधों को खत्म करने का फैसला किया।कानून ने स्वरूप लिंग के बीच यौन सम्बन्धों पर प्रतिबंध लगाया हुआ है क्योंकि इसे प्रकृति के नियमों के खिलाफ समझा गया है और यह कानून …।

अदालत ने दिल्ली में फैसले की घोषणा की जैसे ही लोग उत्साहित होकर जश्न मनाने के लिए इकट्ठे हुए। हालांकि 2009 में नई दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि सहमति से समान लिंग यौन संबंध पर प्रतिबंध मानव अधिकार का उल्लंघन था,लेकिन यह केवल दिल्ली के क्षेत्र में ही लागू था, और   2013 में कुछ मुस्लिम, हिंदू, और ईसाई प्रदर्शनकारियों की याचिकाओं के कारण जल्द ही इसे खारिज कर दिया गया था । सूप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 2013 में समलैंगिक संबंधों के अधिनियम को रद्द करने का निर्णय कानूनी रूप से अरक्षणीय था। निर्णय के मुताबिक भारतीय नागरिकों की केवल एक छोटी आबादी एलजीबीटीक्यू समुदाय से संबंधित थी।

वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, भारत में एलजीबीटी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2013 के निर्णय की संवैधानिकता पर सवाल उठाया।

यह ऐतिहासिक उपलब्धि सामाजिक परिवर्तन का सबूत है जो तेजी से नहीं बल्कि धीरे-धीरे तीन दशकों में हुआ है। कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों के जागरूकता बढ़ाने के कारण समलैंगिक अधिकार हाल ही में तेजी से भारतीय सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा बन रहे हैं। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, लगभग तीस भारतीय शहरों ने 2013 के फैसले का विरोध किया है, जिस कारण एलजीबीटीक्यू समुदाय के लिए नया निर्णय एक जीत हो गया है। यह कानून 159 वर्ष तक जारी रहा है, लेकिन यह भारत में पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया है, परंतु सक्रिय प्रतिभागी, समलैंगिक यौन सम्बन्धों के वैधीकरण के लिए कार्यरत हैं ताकि, एलजीबीटीक्यू समुदाय में अभियोजन और भय को रोकने में मदद हो।

भारतीय दंड संहिता अंग्रेज़ शासन के दौरान लगाई गई थी, और दंड संहिता के 377 वें खंड ने एक ही लिंग के व्यक्ति के साथ किसी भी “शारीरिक” कार्य में भाग लेने के लिए उम्रकेद सज़ा लागू की थी। इस दंड ने भारत के एलजीबीटी समुदाय में डर और उनके खिलाफ भेदभाव पैदा कर दिया। गौर्डियन से ली गई जानकारी के मुताबिक, एक न्यायाधीश, जिन्होने समलैंगिक यौन सम्बन्धों को वेद्ध करने के पक्ष में आदेश दिया, कहा:

“ इतिहास को इनके अधिकार सुनिश्चित करने में देरी के लिए समुदाय के सदस्यों से क्षमा मांगनी चाहिए।”

लोग भले ही इस नए दौर से खुश हों,अब भारत में एक समलैंगिक के रूप में सामने आना संभव है, परंतु समलैंगिकता अब भी भारत में अनुचित है। अब भी, समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ता जिन्होने वैध्यता के लिए कार्यवाही करी, वे अपनी नई सफलता से संतुष्ट नहीं हैं। वे आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं कि भारत में एलजीबीटी समुदाय को अन्य अधिकारों से वंचित ना किया जाए। धारा 377 के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संगठन की संस्थापक, अंजली गोपालन ने सीएनएन से बातचीत में कहा कि “अगला कदम अधिकारों के मुद्दों को लेकर होगा। अभी यह सिर्फ इसे वेध करने की कार्यवाही है, यह अधिकार जो देश के हर नागरिक के पास होना चाहिए और उन्हे वंचित नहीं रखना चाहिए। जैसे कि, शादी का अधिकार, गोद लेने का अधिकार, उत्तराधिकारी बनने का अधिकार। ऐसी चीज़ें जिन पर कोई सवाल नहीं उठाता और जिनसे, स्पष्ट रूप से निश्चित वर्ग के नागरिकों को वंचित रखा जाता है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Previous Post
can sex break your water at 35 weeks

आने वाली बीमारी के बारे में बताती है यह चीज, जानें कैसे

Next Post

Sextortion क्या है और यदि आप शिकार हो जाते हैं तो क्या करना है?

Related Posts